महाराष्ट्र का पुणे शहर… यहां कोथुड़ नामक इलाके में शिलाविहार कॉलोनी के हिमांशु अपार्टमेंट में राठी परिवार रहता था. घर के मुखिया थे केसरीमल राठी. साल था 1994. पुणे के करवे रोड पर राठी परिवार की सागर स्वीट्स नाम से दुकान थी.
दुकान को केसरीमल राठी और उनके बेटे संजय राठी चलाते थे.
दुकान से ठीक-ठाक कमाई हो जाती थी.
परिवार और दुकान, सब कुछ सही चल रहा था. फिर दिन आया 26 अगस्त 1994 का. शाम को पौने सात बजे संजय राठी अपने बहनोई श्रीकांत नवनदार के साथ बाइक पर सवार होकर घर को लौटे.
घर पहुंचते ही दोनों ने डोरबेल बजाई. लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. खटखटाने पर भी किसी ने भी दरवाजा नहीं खोला. तभी संजय की नजर दरवाजे पर लगे ताले पर पड़ी. संजय ने फिर पड़ोसियों से पूछा कि क्या उन्हें पता है कि उनके घर वाले कहां गए हैं.
लेकिन पड़ोसियों को भी कुछ पता नहीं था. संजय को फिर ख्याल आया कि कहीं घर वाले अस्पताल न गए हों, क्योंकि उनकी पत्नी गर्भवती थी. लेकिन उन्हें यह भी ख्याल आया कि ऐसे में सभी घर वाले तो अस्पताल जाएंगे नहीं.
कम से कम उनके यहां काम करने वाली नौकरानी सत्यभामा तो घर पर ही होनी चाहिए. वो भी वहां नहीं थी.
इसलिए संजय की टेंशन और बढ़ गई.


